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राजनीति का चक्रव्यूह या वापसी की हुंकार: क्या बहुजन समाज पार्टी बचा पाएगी अपना वजूद

 


लेखक: लवप्रीत सिंह


भारतीय राजनीति में एक समय उत्तर प्रदेश की सियासत की धुरी रही बहुजन समाज पार्टी (बसपा) आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े और निर्णायक दौर से गुजर रही है। कांशीराम के संघर्षों की बुनियाद और मायावती के कुशल राजनीतिक कौशल के बल पर चार बार उत्तर प्रदेश की सत्ता की कमान संभालने वाली यह पार्टी आज राजनीतिक हाशिये पर है। क्या बसपा अपनी पुरानी चमक वापस पाने में कामयाब होगी, या यह पतन के उस मोड़ पर है जहाँ से वापसी असंभव है? यह सवाल आज भारतीय राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा चर्चा का विषय बना हुआ है।

​जनाधार का खिसकना और चुनावी आंकड़ों की सच्चाई

​बसपा के पारंपरिक वोट बैंक, विशेषकर दलित समाज में पार्टी की पकड़ लगातार कमजोर हुई है। पिछले कुछ चुनावी परिणामों ने पार्टी के इस संकट को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है:

​2022 विधानसभा चुनाव: पार्टी का वोट शेयर गिरकर 12.8% पर सिमट गया और उसे मात्र एक सीट से संतोष करना पड़ा।

​2024 लोकसभा चुनाव: हालात और बदतर हुए, जहाँ बसपा राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से एक भी सीट जीतने में नाकामयाब रही और उसका वोट शेयर लुढ़क कर 9.39% पर आ गया।

​गैर-जाटव दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ओर खिसक चुका है, जबकि जाटव मतदाताओं का एक बड़ा तबका 'इंडिया'  गठबंधन के पाले में जाता दिखा है। जमीनी स्तर पर कैडर आधारित आंदोलनों की कमी और आक्रामक राजनीतिक शैली का अभाव इस गिरावट के मुख्य उत्प्रेरक रहे हैं।

​2007 की तर्ज पर 'बहुजन सोशल इंजीनियरिंग' का दांव

​जमीनी हकीकत से भली-भांति वाकिफ पार्टी सुप्रीमो मायावती ने हार मानने के बजाय एक बार फिर इतिहास दोहराने की ठान ली है। पार्टी 2007 के उस विजयी फॉर्मूले को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है, जिसके दम पर बसपा ने 403 में से 206 सीटें जीतकर अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी।

​इस रणनीति का मुख्य आधार सर्वसमाज को साधना और यह संदेश देना है कि बहुजन केवल एक 'वोट बैंक' नहीं, बल्कि 'शासक वर्ग' बनने की क्षमता रखते हैं।

​ब्राह्मण कार्ड और वर्तमान राजनीतिक समीकरण

​उत्तर प्रदेश में लगातार 15 वर्षों से सत्ता से बाहर चल रही बसपा ने आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए एक बार फिर ब्राह्मण मतदाताओं पर अपनी गहरी नजरें टिकाई हैं। पार्टी का यह आकलन है कि पिछले डेढ़ दशक में समाजवादी पार्टी और भाजपा के शासनकाल में ब्राह्मण समाज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है।

​खास तौर पर यूजीसी  से जुड़े कुछ हालिया विवादों और नीतियों के चलते ब्राह्मण वर्ग में उपजा असंतोष भाजपा की नींद उड़ाए हुए है। ऐसे में, मायावती 2007 की तर्ज पर ब्राह्मण चेहरों को उचित प्रतिनिधित्व देकर इस पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक को अपनी ओर खींचने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं।

​'आनंद बंधुओं' की एंट्री और पारिवारिक राजनीतिक बदलाव

​बसपा के इतिहास में यह पहला मौका होगा जब मायावती के परिवार का प्रत्यक्ष दखल चुनाव मैदान में नजर आएगा। अपने भतीजे आकाश आनंद को पहले पद से हटाना और फिर महज एक महीने के भीतर राष्ट्रीय समन्वयक के रूप में उनकी धमाकेदार वापसी कराना, पार्टी के भीतर एक बड़े बदलाव का संकेत है।

​आकाश आनंद के साथ-साथ उनके छोटे भाई ईशान आनंद को भी पार्टी में राष्ट्रीय समन्वयक की जिम्मेदारी सौंपी गई है। मायावती इस कदम के जरिए युवा पीढ़ी को सीधे तौर पर पार्टी से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। चूंकि उत्तर प्रदेश में आकाश का यह पहला पूर्णकालिक चुनाव प्रचार होगा, ऐसे में पार्टी के सामने सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि क्या ये युवा चेहरे कांशीराम के दौर के जुझारू कैडर को फिर से खड़ा कर पाएंगे।

​अस्तित्व का संकट और भविष्य की राह

​आज राजनीतिक परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। लोकसभा या राज्यसभा में बसपा का कोई सांसद नहीं है, और उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी के पास एक भी विधायक नहीं बचा है (हाल ही में रसरा से विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद)। उत्तराखंड और पंजाब को मिलाकर पार्टी के पास बमुश्किल कुछ ही विधायक बचे हैं। ऐसे में राष्ट्रीय पार्टी के रूप में बसपा की मान्यता तक खतरे के घेरे में है।

​आगामी विधानसभा चुनाव केवल राजनीतिक सीटों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह मायावती के राजनीतिक वजूद और बसपा के अस्तित्व की अंतिम अग्निपरीक्षा है। क्या 'बुआ' मायावती का यह नया सोशल इंजीनियरिंग मॉडल और युवाओं का जोश बसपा को पुनर्जीवित कर पाएगा? इसका जवाब आने वाला वक्त ही देगा।

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