लेखक लवप्रीत सिंह
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी चरम पर है। सत्ताधारी दल भाजपा को मात देने के लिए विपक्षी खेमा इस बार पूरी ताकत और एक बेहद सोची-समझी रणनीति के साथ मैदान में उतरता हुआ दिखाई दे रहा है। विशेष रूप से मुख्य विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व में विपक्ष इस समय भाजपा सरकार के खिलाफ अभूतपूर्व रूप से आक्रामक और एकजुट नजर आ रहा है। पिछले कुछ समय में देश और प्रदेश की राजनीति में आए कई बड़े बदलावों ने विपक्षी दलों के पक्ष में एक मजबूत माहौल तैयार करने का काम किया है।
इस समय प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा मुद्दा राम मंदिर निर्माण से जुड़ा कथित चंदा चोरी कांड बना हुआ है। विपक्षी दलों ने अयोध्या में जमीन खरीद-बिक्री में हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं और चंदा चोरी के आरोपों को जनता के बीच पूरी ताकत से उठाया है। इस पूरे घटनाक्रम ने समूचे विपक्ष के पक्ष में एक जबरदस्त माहौल बना दिया है। जो मुद्दा कभी भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार हुआ करता था, वही आज विपक्ष के हाथों में सरकार को घेरने का सबसे बड़ा जरिया बन गया है। विपक्षी दल इस मुद्दे के जरिए जनता को यह समझाने में काफी हद तक सफल रहे हैं कि धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले लोगों ने आस्था के साथ खिलवाड़ किया है। इस नैरेटिव के बनने से न केवल विपक्ष का पारंपरिक वोटर बल्कि एक बड़ा न्यूट्रल और सनातनी मतदाता वर्ग भी सरकार की कार्यप्रणाली से खफा नजर आ रहा है, जिससे विपक्षी गठबंधन का पलड़ा भारी होता दिख रहा है।
अगर विभिन्न विपक्षी दलों की जमीनी तैयारियों पर नजर डालें, तो मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी इस बार बेहद अनुशासित और 'इलेक्शन मोड' में काम कर रही है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस बार केवल रैलियों और बयानों तक सीमित न रहकर सीधे बूथ स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत की है। पार्टी ने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के अपने फॉर्मूले को जमीन पर उतारने के लिए जिला स्तर पर बड़े सम्मेलन किए हैं। चंदा चोरी कांड के बाद सपा ने अपने कैडर को गांव-गांव जाकर इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही युवाओं को लुभाने के लिए 'नौकरी का कैलेंडर' और पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली जैसे वादों ने सपा के पक्ष में एक सकारात्मक माहौल खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक, सपा का चुनावी प्रबंधन इस बार पहले से कहीं ज्यादा चुस्त और पेशेवर दिखाई दे रहा है।
वहीं दूसरी तरफ, अन्य विपक्षी दल भी अपनी-अपनी गोटियां सेट करने में जुटे हैं। कांग्रेस पार्टी इस बार समाजवादी पार्टी के साथ एक मजबूत और व्यावहारिक गठबंधन के तहत आगे बढ़ती दिख रही है। पिछले चुनावों के अनुभवों से सीख लेते हुए कांग्रेस इस बार बड़ी-बड़ी बातें करने के बजाय उन सीटों पर ध्यान केंद्रित कर रही है जहां उसका पारंपरिक वोट बैंक मजबूत रहा है। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व लगातार बेरोजगारी, paper leak और महंगाई के मुद्दों पर सरकार को घेर रहा है, जिससे शहरी और मध्यमवर्गीय मतदाताओं में विपक्ष के प्रति भरोसा बढ़ा है। सपा और कांग्रेस का यह आपसी समन्वय और सीट शेयरिंग को लेकर दिख रही परिपक्वता भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी भले ही शांत दिख रही हो, लेकिन उसकी जमीनी तैयारियां अंदरखाने जारी हैं। मायावती अपने काडर वोटरों को एकजुट रखने के लिए लगातार छोटी बैठकें और समीक्षाएं कर रही हैं। बसपा इस बार दलित-मुस्लिम समीकरण को साधने की कोशिश में है, जो त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति में कई सीटों पर खेल बदल सकता है। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी (AAP) जैसे छोटे दल भी मुफ्त बिजली, पानी और बेहतर शिक्षा-स्वास्थ्य के दिल्ली मॉडल को लेकर जनता के बीच पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे विपक्षी वोटों का बिखराव रुक सके और एक साझा एजेंडा तैयार हो।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ा विपक्ष इस बार पूरी तरह तैयार और आत्मविश्वास से लबरेज दिख रहा है। राम मंदिर चंदा चोरी कांड ने जहां विपक्ष को नैतिक रूप से भाजपा पर बढ़त दिला दी है, वहीं समाजवादी पार्टी की बूथ स्तर की मुस्तैदी और विपक्षी दलों का बढ़ता तालमेल यह साफ संकेत दे रहा है कि सत्ता की राह इस बार किसी के लिए भी आसान नहीं होने वाली है।

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